Santosh Mishra, SC/ST Act, BNS 296, obscenity, public view, audio clip, WhatsApp, caste-indicative language, Chhattisgarh High Court, acquittal
 21 Apr, 2026
Listen in 00:52 mins | Read in 24:00 mins
EN
HI

Chhattisgarh Rajya Vs. Santosh Kumar Mishra

  Chhattisgarh High Court 2273/2025
Link copied!

Case Background

As per case facts, the appellant, Santosh Mishra, was accused of using caste-indicative and obscene language against an SC/ST MLA via a WhatsApp audio clip, leading to an FIR under ...

Bench

Applied Acts & Sections

No Acts & Articles mentioned in this case

Hello! How can I help you? 😊
Disclaimer: We do not store your data.
Document Text Version

1 / 16

{Cr. A. No.-2273 of 2025}

2026:CGHC:18118

प्र

तिवेद्य

त्तीसगढ़ उच्च न्यायालय

, बि

लासपुर

नि

र्णय सुरक्षित दिनांक

-27/03/2026

नि

र्णय उद्घोषित दिनांक

-21/04/2026

दा

ण्डिक अपील क्रमांक

-2273 /2025

सं

तोष मिश्रा

पि

ता

-ओ

मप्रकाश मिश्रा

, उम्र-लगभग 52 व

र्ष

, नि

वासी

-ग्रा

-न

रसिंहपुर

,

पु

लिस थाना व तहसील

-रा

जपुर

, जि

ला

-ब

लरामपुर

-रा

मानुजगंज

, छ

त्तीसगढ़

-----अ

पीलार्थी

/अ

भियुक्त

वि

रूद्घ

1.छ

त्तीसगढ़ राज्य

, द्वा

रा थाना प्रभारी

, पु

लिस थाना

-रा

जपुर

, जि

ला

-ब

लरामपुर

-

रा

मानुजगंज

, छ

त्तीसगढ़

(रा

ज्य

)

2.जग

वंशी यादव

पिता

-शि

वमंगल यादव

, उम्र-लगभग 38 व

र्ष

, नि

वासी

-ग्रा

-डां

डखंडुवा

,

या राजपुर

, पु

लिस थाना

-रा

जपुर

, जि

ला

-ब

लरामपुर

-रा

मानुजगंज

, छ

त्तीसगढ़

(प्रा

र्थी

)

-----उ

त्तरवादीगण

पीलार्थी

/अ

भियुक्त द्वारा

:श्री

गगन पाण्डेय

, अ

धिवक्ता ।

त्तरवादी

/रा

ज्य द्वारा

:श्री

अनीश तिवारी

, उ

प शासकीय अधिवक्ता ।

न्

यायमूर्ति श्री संजय कुमार जायसवाल

2 / 16

{Cr. A. No.-2273 of 2025}

!! सी.ए.वी. नि

र्णय

!!

1.धा

रा

14(क)( )

i

नुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति

(अत्

याचार निवारण

)

धिनियम

, 1989 (जि

से आगे संक्षेप में

"वि

शेष अधिनियम

" से

संबोधित किया जा रहा है

)

के

अंतर्गत प्रस्तुत इस अपील में विचारण न्यायालय

-वि

शेष न्यायाधीश

(वि

शेष

धिनियम

), ब

लरामपुर स्थान रामानुजगंज

, छ

त्तीसगढ़ द्वारा विशेष सत्र प्रकरण

(ए

ट्रो

.)

क्र

मांक

-37/2025 “छ

त्तीसगढ़ राज्य

वि

रूद्घ

संतोष कुमार मिश्रा

में दिनांक

-10/10/

2025 को

अपीलार्थी पर विरचित आरोप अंतर्गत धारा

-296 भा

रतीय न्याय संहिता

,

2023 त

था विशेष अधिनियम की धारा

-3(1)(ध) को

चुनौती दी गई है ।

उक्त आ

देश को

गे संक्षेप में

“प्रश्

नाधीन आदेश

से संबोधित किया जा रहा है ।

2.त

थ्य संक्षेप में इस प्रकार है कि अपीलार्थी

/अ

भियुक्त संतोष मिश्रा

, ज

नपद पंचायत राजपुर

में

सहायक श्रेणी

-

III

के

पद पर कार्यरत है । अभिलेख से यह परिलक्षित होता है कि

सं

बंधित क्षेत्र के निर्वाचित विधायक

, जो

वर्तमान में मंत्री पद पर आसीन हैं

, त

था उसी जिले

के

अन्य विधानसभा क्षेत्र की एक अन्य महिला विधायक

, जो

अनुसूचित जनजाति वर्ग से

सं

बंधित हैं

(जि

न्हें आगे संक्षेप में क्रमशः ‘मंत्री जी’ एवं ‘विधायक’ के रूप में संबोधित

कि

या गया है

), प्रकर

ण की पृष्ठभूमि से संबंधित हैं । उक्त दोनों जनप्रतिनिधि छत्तीसगढ़

शा

सन के सत्तारूढ़ राजनीतिक दल

, भा

रतीय जनता पार्टी के सदस्य हैं तथा आदिवासी

माज से संबंध रखते हैं ।

3.अ

भियोजन का मामला संक्षेप में इस प्रकार है कि प्रार्थी

/शि

कायतकर्ता जगवंशी यादव

,

भा

रतीय जनता पार्टी के राजपुर मण्डल के अध्यक्ष हैं । दिनांक

17.07.2025 को

उन्हें

भा

रतीय जनता पार्टी के बरियो मण्डल अध्यक्ष जितेन्द्र जायसवाल द्वारा ‘व्हाट्सऐप’ एवं

3 / 16

{Cr. A. No.-2273 of 2025}

दू

रभाष के माध्यम से यह सूचना दी गई कि अपीलार्थी

/अ

भियुक्त द्वारा ‘मंत्री जी’ एवं

विधायक’ के प्रति खुलेआम जातिसूचक गाली

-ग

लौज करते हुए आदिवासी समाज तथा

भा

रतीय जनता पार्टी को अपमानित किया गया

, जि

ससे क्षेत्र में आक्रोश व्याप्त हो गया ।

उक्त

शिकायत के आधार पर थाना नया राजपुर

, जि

ला बलरामपुर

(छ

त्तीसगढ़

) में

उसी

दि

न अपराध क्रमांक

165/2025 पं

जीबद्ध किया गया । विवेचना के दौरान शिकायतकर्ता

से

संबंधित ध्वनि

-अं

कन

(ऑ

डियो क्लिप

) यु

क्त पेन ड्राइव जब्त की गई

, जि

सके संबंध में

भा

रतीय साक्ष्य अधिनियम

, 2023 की

धारा

63(4)(ग) के

अंतर्गत प्रमाणपत्र प्रस्तुत

कि

या गया । साथ ही अपीलार्थी का नियुक्ति प्रमाणपत्र जब्त किया गया

, सा

क्षियों के कथन

ले

खबद्ध किए गए तथा विवेचना उपरांत अभियोगपत्र प्रस्तुत किया गया ।

4.अ

पीलार्थी

/अ

भियुक्त के विद्वान अधिवक्ता का तर्क है कि भारतीय न्याय संहिता

, 2023 की

धा

रा

296 के

अंतर्गत आरोप के लिए आवश्यक ‘अश्लीलता’ तथा ‘लोक स्थान अथवा

उस

के समीप’ होने के तत्व प्रथमदृष्टया स्थापित नहीं होते

, अ

तः उक्त धारा के अंतर्गत

रोप की रचना विधिसंगत नहीं है । यह तर्क दिया गया है कि

'मं

त्री जी

' का

पुलिस द्वारा

थन नहीं लिया गया है तथा महिला विधायक द्वारा इस अपील में अनापत्ति व्यक्त की गयी

है

। यह भी तर्क किया गया है कि शिकायतकर्ता जगवंशी यादव इस प्रकरण में पीड़ित की

श्रे

णी में नहीं आते

, अ

तः उनके द्वारा प्रस्तुत शिकायत विधि की दृष्टि में ग्राह्य नहीं है ।

भी

तर्क किया गया है कि विशेष अधिनियम के अंतर्गत यह आवश्यक है कि कथित अपराध

लो

क दृष्टि में आने वाले स्थान पर घटित हुआ हो

, जि

से अभियोजन द्वारा प्रथमदृष्टया

स्

थापित नहीं किया गया है । इस संबंध में कोई विशेष या स्पष्ट साक्ष्य संकलित नहीं किया

या है । कथित ध्वनि

-अं

कन

(ऑ

डियो क्लिप

) का

न तो लिप्यांतरण किया गया है और

ही यह स्पष्ट है कि उसमें कौन

-कौ

न से शब्द प्रयुक्त हुए हैं । यह भी स्पष्ट नहीं है कि

4 / 16

{Cr. A. No.-2273 of 2025}

उक्त ध्

वनि

-अं

कन किसके द्वारा प्रसारित किया गया

, कि

स स्थान पर तैयार किया गया तथा

कि

स स्थान पर सुना गया । विद्वान अधिवक्ता का यह भी तर्क है कि विवेचना के दौरान

थित घटनास्थल का कोई नक्शा तैयार नहीं किया गया

, जि

ससे उसे ‘लोक दृष्टि में आने

वा

ले स्थान’ के रूप में स्थापित किया जा सके । साथ ही

, क

थित जातिसूचक गाली

-

लौज किसी विशिष्ट व्यक्ति के समक्ष किए जाने का भी कोई प्रत्यक्ष साक्ष्य उपलब्ध नहीं

है

। अपीलार्थी

/अ

भियुक्त की आवाज का नमूना नहीं लिया गया

, न

ही उसका कोई दूरभाष

पकरण जब्त किया गया है

, और

न ही ऐसा कोई साक्ष्य संकलित किया गया है जिससे यह

स्

थापित हो सके कि उक्त ध्वनि

-अं

कन का प्रसारण अपीलार्थी

/अ

भियुक्त द्वारा किया गया ।

पर्युक्त परिस्थितियों में यह तर्क दिया गया है कि धारा

296 भा

रतीय न्याय संहिता एवं

वि

शेष अधिनियम की धारा

3(1)(ध) के

आवश्यक तत्वों की पूर्ति नहीं होती है

, त

था

पलब्ध साक्ष्य के आधार पर विचारण जारी रखना न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा ।

तः अपील स्वीकार करते हुए ‘प्रश्नाधीन आदेश’ अपास्त किया जाए तथा अपीलार्थी

/

भियुक्त को आरोपित अपराध से उन्मुक्त किया जाए । विद्वान अधिवक्ता द्वारा अपने तर्क

के

समर्थन में निम्नवत न्यायदृष्टांतों का भी हवाला दिया गया है

-

.

I

N.S. Madhanagopal and another v. K. Lalitha, (2022) 17 SCC

818.

.

II

Karuppudayar v. State Rep. by the Deputy Superintendent of

Police, Lalgudi Trichy & Ors., SLP (Criminal) No. 8779-8779 of

2024 dated 31.01.2025(2025 INS 132).

.

III

Bhagwant Singh Randhawa and another v. State of Punjab, CRM-

P No.-42685 of 2021 (O&M).

5.रा

ज्य

/उ

त्तरवादी क्रमांक

-1 के

विद्वान अधिवक्ता का तर्क है कि विवेचना के दौरान संबंधित

हिला विधायक का कथन पुलिस द्वारा अभिलिखित किया गया है

, जि

समें उन्होंने कथित

5 / 16

{Cr. A. No.-2273 of 2025}

ध्

वनि

-अं

कन

(ऑ

डियो क्लिप

) को

सुनकर स्वयं के क्षुब्ध होने का उल्लेख किया है । उक्त

ध्

वनि

-अं

कन को एक विशिष्ट जाति वर्ग को अपमानित एवं क्षुब्ध करने के आशय से प्रसारित

कि

या गया

, अ

तः ‘पीड़ित’ की परिधि में वे सभी व्यक्ति सम्मिलित होते हैं जिन्होंने उक्त

ध्

वनि

-अं

कन को सुना और जिनमें क्षोभ उत्पन्न हुआ ।

उक्त

महिला विधायक का जाति

प्र

माणपत्र अभिलेख पर उपलब्ध है । अपीलार्थी

/अ

भियुक्त

, अ

नुसूचित जाति

/ज

नजाति

र्ग का सदस्य नहीं है । अपीलार्थी

/अ

भियुक्त द्वारा उक्त ध्वनि

-अं

कन को सामान्य जन के

ध्य ‘व्हाट्सऐप’ समूह के माध्यम से जानबूझकर प्रसारित किया गया

, जि

ससे भारतीय

न्

याय संहिता

, 2023 की

धारा

296 त

था विशेष अधिनियम की धारा

3(1)(ध) के

वश्यक तत्वों की पूर्ति होती है । अपीलार्थी पक्ष के तर्क स्वीकार्य नहीं हैं अतः अपील

नि

रस्त किया जाए । विद्वान अधिवक्ता द्वारा अपने तर्क के समर्थन में

Sooraj V.

Sukumar v. State of Kerala Represented by Public Prosecutor and

Another के

न्यायदृष्टांत का हवाला दिया गया है ।

6.इस अ

पील के संबंध में पीड़िता

(म

हिला विधायक

) को

विधिवत् सूचना प्रेषित की गई थी ।

जि

सके अनुपालन में पीड़िता द्वारा दिनांक

12.01.2026 को

संबंधित जिला विधिक सेवा

प्रा

धिकरण के माध्यम से आभासी रूप से उपस्थित हुई तथा इस अपील के संबंध में कोई

पत्ति न होने की अभिव्यक्ति की गई ।

7.उभ

यपक्ष के तर्क श्रवण किए गए और विचारण न्यायालय के मूल अभिलेख तथा इस

पीलीय न्यायालय के अभिलेख का सूक्ष्मतापूर्वक परिशीलन किया गया ।

8.वि

चारण न्यायालय द्वारा अपीलार्थी

/अ

भियुक्त पर “प्रश्नाधीन आदेश” के तहत विरचित

रोप निम्नानुसार हैः

-

6 / 16

{Cr. A. No.-2273 of 2025}

“1.आ

पने दिनांक

17.07.2025 को

शाम

14.12 ब

जे

, रा

जपुर

,

जि

ला

-ब

लरामपुर

-रा

मानुजगंज

(छ.ग.) में

मंत्री

( )

xxxx

वं

सा

मरी विधायक

( )

xxxx

जो

कि अनुसूचित जनजाति की

दस्य है

, को

जातिगत एवं अश्लील गाली गुप्तार कर उसे

वा

ट्सअप ग्रुप में प्रसारित कर उन्हे व सुनने वालो को क्षोभ

का

रित किया ।

2.उक्त

दिनांक

, स

मय व स्थान पर आप स्वयं अनुसूचित जाति या

नुसूचित जनजाति का सदस्य न होते हुए

, मं

त्री

( )

xxxx

वं

सा

मरी विधायक

( )

xxxx

जो

कि अनुसूचिज जनजाति की

दस्य है

, को

जातिगत एवं अश्लील गाली गुप्तार कर उसे

वा

ट्सअप ग्रुप में प्रसारित कर उन्हे व सुनने वालो को क्षोभ

का

रित किया ।

9.स

र्वप्रथम

, अ

पीलार्थी पक्ष द्वारा ‘पीड़ित’ की स्थिति के संबंध में उठाए गए प्रश्न पर विचार

कि

या जाना अपेक्षित है । इस संदर्भ में अभिलेख का अवलोकन करने पर यह परिलक्षित

हो

ता है कि ‘मंत्री जी’ का कोई कथन पुलिस द्वारा अभिलिखित नहीं किया गया है

, ज

बकि

सं

बंधित महिला विधायक का कथन अवश्य अभिलिखित किया गया है । यह भी निर्विवाद

है

कि अपीलार्थी

/अ

भियुक्त स्वयं अनुसूचित जाति अथवा अनुसूचित जनजाति वर्ग का

दस्य नहीं है तथा इस संबंध में उसके द्वारा कोई दावा भी प्रस्तुत नहीं किया गया है ।

भिलेख पर उपलब्ध जाति प्रमाणपत्र से यह स्पष्ट होता है कि उक्त महिला विधायक

कंवर’ जाति से संबंधित हैं

, जो

अनुसूचित जनजाति वर्ग में आती है

, ज

बकि ‘मंत्री जी’ के

सं

बंध में कोई जाति प्रमाणपत्र अभिलेख पर उपलब्ध नहीं है । यह भी परिलक्षित होता है

कि

पुलिस में प्रस्तुत लिखित शिकायत एक राजनीतिक दल के पदाधिकारी द्वारा की गई है

था महिला विधायक के अतिरिक्त जिन अन्य साक्षियों के कथन अभिलिखित किए गए हैं

,

वे

भी उसी राजनीतिक दल अथवा संबंधित जाति वर्ग से संबद्ध व्यक्ति हैं ।

7 / 16

{Cr. A. No.-2273 of 2025}

10.अ

नुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति

(अत्

याचार निवारण

) अ

धिनियम

, 1989 की

धा

रा

-2 (ङग) में

“पीड़ित” को निम्नानुसार परिभाषित किया गया हैः

-

“(ङग)“पी

ड़ित” से ऐसा व्यक्ति अभिप्रेत है

, जो

धारा

2 की

उपधारा

(1)

के

खंड

(ग) के

अधीन

'अ

नूसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति’

की

परिभाषा के भीतर आता है तथा जो इस अधिनियम के अधीन

कि

सी अपराध के होने के परिणामस्वरूप शारीरिक

, मा

नसिक

,

नोवैज्ञानिक

, भा

वनात्मक या धनीय हानि या उसकी संपत्ति को

हा

नि वहन या अनुभव करता है और जिसके अंतर्गत उसके नातेदार

वि

धिक संरक्षक और विधिक वारिस भी हैं

;”

11.पी

ड़ित की उपर्युक्त परिभाषा से यह स्पष्ट होता है कि यदि अनुसूचित जाति अथवा

नुसूचित जनजाति वर्ग के किसी व्यक्ति को अधिनियम में परिभाषित अपराध के

रिणामस्वरूप शारीरिक

, मा

नसिक

, म

नोवैज्ञानिक

, भा

वनात्मक अथवा आर्थिक हानि होती

है, या

उसकी संपत्ति को क्षति पहुँचती है

, तो

वह ‘पीड़ित’ की श्रेणी में आएगा ।

12.भा

रतीय न्याय संहिता

, 2023 की

धारा

-296 नि

म्नानुसार हैः

-

“296.अश्

लील कार्य और गाने

-जो

कोई

,-

(क)कि

सी लोक स्थान में कोई अश्लील कार्य करता है

; या

(ख)कि

सी लोक स्थान में या उसके समीप कोई अश्लील गाने

, ‘प

वांड़े’ या

शब्

द गाएगा

, सु

नाएगा या उच्चारित करेगा

, जि

ससे दूसरों को क्षोभ होता

हो ,

ह दोनों में से किसी भांति के कारावास से

, जि

सकी अवधि तीन मास

क की हो सकेगी

, या

जुर्माने से जो एक हजार रूपये तक का हो सकेगा

, या

दो

नों में से

, द

ण्डित किया जाएगा ।

"

8 / 16

{Cr. A. No.-2273 of 2025}

13.अ

नुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति

(अत्

याचार निवारण

) अ

धिनियम

, 1989 की

धा

रा

-3 (1)(ध) में

“पीड़ित” को निम्नानुसार परिभाषित किया गया हैः

-

“3.अत्

याचार के अपराधों के लिए दंड़

-(1) को

ई भी व्यक्ति

, जो

अनुसूचित

जा

ति या अनुसूचित जनजाति का सदस्य नहीं है

,-

(ध)लो

क दृष्टि में आने वाले किसी स्थान पर जाति के नाम से अनुसूचित

जा

ति या अनुसूचित जनजाति के किसी सदस्य को गाली गलौज करेगा

;

, का

रावास से

, जि

सकी अवधि छह मास से कम की नहीं होगी

, किं

तु

जो

पांच वर्ष तक की हो सकेगी

, और

जुर्माने से

, दं

डनीय होगा ।

14.वि

चाराधीन मामले में यह परिलक्षित होता है कि न केवल संबंधित महिला विधायक ने अपने

पु

लिस कथन में क्षोभ

/पी

ड़ा व्यक्त की है

, ब

ल्कि उनके जाति वर्ग के अन्य व्यक्तियों द्वारा भी

क्षो

भ व्यक्त किया गया है । ऐसी स्थिति में यह अपेक्षित नहीं है कि शिकायत अनिवार्यतः

उस व्

यक्ति द्वारा ही प्रस्तुत की जाए जिसके विषय में कहा गया है । यदि शिकायत किसी

अन्

य व्यक्ति द्वारा की गई हो

, कि

न्तु संबंधित जाति वर्ग के व्यक्तियों द्वारा क्षोभ व्यक्त किया

या हो

, तो

मात्र इस आधार पर शिकायत को असंगत अथवा अभियोजन संचालन हेतु

पर्याप्त नहीं ठहराया जा सकता । धारा

296 भा

रतीय न्याय संहिता

, 2023 के

प्रावधान

नुसार

"दू

सरों को क्षोभ होता हो

" से

भी हर वह व्यक्ति पीड़ित माना जाएगा जिसे क्षोभ

हो

ता है । विशेष अधिनियम का उद्देश्य ही वर्ग विशेष को अत्याचार से निवारण प्रदान करना

है

। अतः

, अ

पीलार्थी पक्ष का यह प्रथम तर्क स्वीकार योग्य नहीं पाया जाता कि

शि

कायतकर्ता

, पी

ड़ित की श्रेणी में नहीं आता इसलिये आपराधिक मामला चलने योग्य नहीं

है

9 / 16

{Cr. A. No.-2273 of 2025}

15.अ

पीलार्थी

/अ

भियुक्त के विद्वान अधिवक्ता का तर्क है कि भारतीय न्याय संहिता

, 2023 की

धा

रा

296 के

अंतर्गत अपराध स्थापित करने हेतु यह आवश्यक है कि अभियुक्त द्वारा

‘अश्

लील’ शब्दों का उच्चारण किया गया हो

, जि

ससे अन्य व्यक्तियों में क्षोभ उत्पन्न हुआ

हो

। अपने इस तर्क के समर्थन में विद्वान अधिवक्ता ने

. . (

N S Madhanagopal

पू

र्वोक्त

)

के

न्यायदृष्टांत का हवाला दिया है

, जि

समें माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा ‘अश्लीलता’

की

अवधारणा के संबंध में अभिमत व्यक्त किया गया है

, जो

निम्नानुसार है—

“6. Section 294(b)IPC talks about the obscene acts and songs.

Section 294IPC as a whole reads thus:

“294. Obscene acts and songs.—Whoever, to the

annoyance of others—

(a)does any obscene act in any public place, or

(b)sings, recites or utters any obscene songs,

ballad or words, in or near any public place,

shall be punished with imprisonment of either

description for a term which may extend to

three months, or with fine, or with both.”

7.It is to be noted that the test of obscenity under Section

294(b)IPC is whether the tendency of the matter charged as

obscenity is to deprave and corrupt those whose minds are

open to such immoral influences. The following passage

from the judgment authored by K.K. Mathew, J. (as his

Lordship then was) reported in P.T. Chacko v. Nainan

Chacko [P.T. Chacko v. Nainan Chacko, 1967 SCC OnLine

Ker 125 : 1967 KLT 799] explains as follows : (SCC OnLine

Ker paras 5-6)

10 / 16

{Cr. A. No.-2273 of 2025}

“5.The only point argued was that the 1st accused

has not committed an offence punishable under

Section 294(b)IPC, by uttering the words

above-mentioned. The courts below have held

that the words uttered were obscene and the

utterance caused annoyance to the public. I am

not inclined to take this view. In R. v. Hicklin

[R. v. Hicklin, (1868) LR 3 QB 360] , QB at p.

371 Cockburn, C.J. Laid down the test of

“obscenity” in these words : (QB p. 371)

‘… the test of obscenity is this, whether the

tendency of the matter charged as obscenity is

to deprave and corrupt those whose minds are

open to such immoral influences.…’

6.This test has been uniformly followed in India.

The Supreme Court has accepted the

correctness of the test in Ranjit D. Udeshi v.

State of Maharashtra [Ranjit D. Udeshi v. State

of Maharashtra, 1964 SCC OnLine SC 52 : AIR

1965 SC 881] . In Roth v. United States [Roth v.

United States, 1957 SCC OnLine US SC 106 : 1

L Ed 2d 1498 : 354 US 476 (1957)] , Chief

Justice Warren said that the test of “obscenity”

is the ‘substantial tendency to corrupt by

arousing lustful desires’. Mr Justice Harlan

observed that in order to be “obscene” the

matter must “tend to sexually impure

thoughts”. I do not think that the words uttered

in this case have such a tendency. It may be

that the words are defamatory of the

complainant, but I do not think that the words

11 / 16

{Cr. A. No.-2273 of 2025}

are “obscene” and the utterance would

constitute an offence punishable under Section

294(b)IPC.”

16.उ

पर्युक्त न्यायदृष्टांत में प्रतिपादित ‘अश्लीलता’ की अवधारणा के आलोक में विचाराधीन

प्रकर

ण के तथ्यों का परीक्षण करने पर यह परिलक्षित होता है कि जिस कथित ध्वनि

-

अं

कन

(ऑ

डियो क्लिप

) के

प्रसारण का आरोप अपीलार्थी

/अ

भियुक्त संतोष मिश्रा पर

गाया गया है

, उस

के संबंध में न तो अपीलार्थी का कोई दूरभाष यंत्र जब्त किया गया है

और

न ही उसकी आवाज का नमूना संकलित किया गया है ।

भिलेख से यह भी स्पष्ट है

कि

शिकायतकर्ता जगवंशी यादव द्वारा धारा

63(4)(ग) भा

रतीय साक्ष्य अधिनियम

,

2023 के

अंतर्गत प्रमाणपत्र सहित जो पेन ड्राइव प्रस्तुत की गई

, उस

का कोई लिप्यांतरण

तै

यार नहीं किया गया है । यद्यपि लिखित शिकायत एवं साक्षियों के कथनों में इस तथ्य का

ल्लेख है कि उक्त ध्वनि

-अं

कन में जातिसूचक एवं अश्लील गाली

-ग

लौज की गई है

,

थापि किन विशिष्ट शब्दों का प्रयोग किया गया

, इस

का कोई स्पष्ट एवं ठोस विवरण किसी

भी

कथन में उपलब्ध नहीं है । यह भी परिलक्षित होता है कि उक्त ध्वनि

-अं

कन को

लाकर सुनने संबंधी कोई पंचनामा तैयार नहीं किया गया है । परिणामतः

, व

र्तमान

भिलेखीय स्थिति में यह परीक्षण करना संभव नहीं है कि विवादित ध्वनि

-अं

कन में कथित

रू

प से प्रयुक्त शब्द वास्तव में जातिसूचक अथवा अश्लील थे या नहीं

, अ

थवा वे किसी वर्ग

वि

शेष को अपमानित या क्षुब्ध करने वाले थे । अतः

, उ

पर्युक्त न्यायदृष्टांत के आलोक में

,

थित शब्दों की प्रकृति के संबंध में कोई निश्चित अभिमत इस स्तर पर व्यक्त किया जाना

सं

भव नहीं है ।

17.अ

पीलार्थी

/अ

भियुक्त के विद्वान अधिवक्ता का प्रमुख तर्क यह है कि भारतीय न्याय संहिता

,

2023 की

धारा

296 के

अंतर्गत कथित घटना के संबंध में कोई विशिष्ट स्थान का उल्लेख

12 / 16

{Cr. A. No.-2273 of 2025}

हीं किया गया है

, जि

सके आधार पर उसे ‘लोक स्थान’ के रूप में निरूपित किया जा सके

थवा यह स्थापित किया जा सके कि वह स्थान विशेष अधिनियम के प्रावधानों के अनुरूप

लोक दृष्टि में आने वाला स्थान’ था ।

18.अ

पीलार्थी

/अ

भियुक्त के विद्वान अधिवक्ता द्वारा प्रस्तुत

(

Karuppudayar

पू

र्वोक्त

) में

मा

ननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा प्रतिपादित कण्डिका निम्नानुसार है—

“9.A perusal of Section 3(1)(r) of the SC-ST Act would reveal

that for constituting an offence thereunder, it has to be

established that the accused intentionally insults or

intimidates with intent to humiliate a member of a

Scheduled Caste or a Scheduled Tribe in any place within

public view. Similarly, for constituting an offence under

Section 3(1)(s) of the SC-ST Act, it will be necessary that

the accused abuses any member of a Scheduled Caste or a

Scheduled Tribe by caste name in any place within public

view.

10.The term “any place within public view” initially came up

for consideration before this Court in the case of Swaran

Singh v. State through Standing Counsel, (2008) 8 SCC 435.

This Court in the case of Hitesh Verma v. State of

Uttarakhand, (2020) 10 SCC 710 referred to Swaran Singh

(supra) and reiterated the legal position as under:

“14.Another key ingredient of the provision is insult

or intimidation in “any place within public

view”. What is to be regarded as “place in

public view” had come up for consideration

before this Court in the judgment reported as

Swaran Singh v. State [Swaran Singh v. State,

(2008) 8 SCC 435 : (2008) 3 SCC (Cri) 527].

The Court had drawn distinction between the

13 / 16

{Cr. A. No.-2273 of 2025}

expression “public place” and “in any place

within public view”. It was held that if an

offence is committed outside the building e.g.

in a lawn outside a house, and the lawn can be

seen by someone from the road or lane outside

the boundary wall, then the lawn would

certainly be a place within the public view. On

the contrary, if the remark is made inside a

building, but some members of the public are

there (not merely relatives or friends) then it

would not be an offence since it is not in the

public view (sic) [Ed. : This sentence appears

to be contrary to what is stated below in the

extract from Swaran Singh, (2008) 8 SCC 435,

at p. 736d-e, and in the application of this

principle in para 15, below:“Also, even if the

remark is made inside a building, but some

members of the public are there (not merely

relatives or friends) then also it would be an

offence since it is in the public view.”]. The

Court held as under : (SCC pp. 443-44, para

28)

“28.It has been alleged in the FIR that

Vinod Nagar, the first informant,

was insulted by Appellants 2 and 3

(by calling him a “chamar”) when

he stood near the car which was

parked at the gate of the premises.

In our opinion, this was certainly a

place within public view, since the

gate of a house is certainly a place

within public view. It could have

been a different matter had the

alleged offence been committed

inside a building, and also was not

in the public view. However, if the

offence is committed outside the

building e.g. in a lawn outside a

house, and the lawn can be seen

by someone from the road or lane

outside the boundary wall, the

lawn would certainly be a place

within the public view. Also, even

if the remark is made inside a

14 / 16

{Cr. A. No.-2273 of 2025}

building, but some members of the

public are there (not merely

relatives or friends) then also it

would be an offence since it is in

the public view. We must,

therefore, not confuse the

expression “place within public

view” with the expression “public

place”. A place can be a private

place but yet within the public

view. On the other hand, a public

place would ordinarily mean a

place which is owned or leased by

the Government or the

municipality (or other local body)

or gaon sabha or an

instrumentality of the State, and

not by private persons or private

bodies.” (emphasis in original)”

11.It could thus be seen that, to be a place ‘within public view’,

the place should be open where the members of the public

can witness or hear the utterance made by the accused to

the victim. If the alleged offence takes place within the four

corners of the wall where members of the public are not

present, then it cannot be said that it has taken place at a

place within public view.”

19.उ

पर्युक्त न्यायदृष्टांतों के आलोक में विचाराधीन प्रकरण के तथ्यों का परीक्षण करने पर यह

स्

पष्ट होता है कि कथित ध्वनि

-अं

कन

(ऑ

डियो क्लिप

) से

संबंधित घटना का कोई विशिष्ट

स्

थान अभियोजन द्वारा अभिलेख पर स्पष्ट नहीं किया गया है

, न

ही अभियोजन का यह

मा

मला है कि उक्त घटना का कोई प्रत्यक्षदर्शी साक्षी है ।

भिलेख से यह भी परिलक्षित

हो

ता है कि उक्त ध्वनि

-अं

कन के प्रसारण अथवा परिचालन के संबंध में अपीलार्थी

/

भियुक्त के विरुद्ध कोई ठोस साक्ष्य संकलित नहीं किया गया है । यद्यपि कुछ साक्षियों

द्वा

रा यह कथन किया गया है कि उसमें आवाज़ अपीलार्थी की है

, त

थापि इसकी पुष्टि हेतु न

तो

अपीलार्थी की आवाज का नमूना लिया गया है और न ही कोई वैज्ञानिक परीक्षण कराया

15 / 16

{Cr. A. No.-2273 of 2025}

या है । इसी प्रकार

, उक्त घ

टना किस स्थान पर घटित हुई

, इस

संबंध में भी कोई साक्ष्य

सं

कलित नहीं है । न ही यह स्पष्ट किया गया है कि कथित ध्वनि

-अं

कन को शिकायतकर्ता

थवा अन्य साक्षियों द्वारा कब और कहाँ सुना गया । साथ ही

, पु

लिस द्वारा कथित

टनास्थल का कोई नक्शा भी तैयार नहीं किया गया है । यही कारण है कि विरचित

रोप में भी घटनास्थल के रूप में किसी विशिष्ट स्थान का उल्लेख नहीं है । उपर्युक्त

रिस्थितियों में

, य

ह निष्कर्षित करना संभव नहीं है कि कथित घटना किसी ‘लोक स्थान’

र घटित हुई अथवा वह ‘लोक दृष्टि में आने वाला स्थान’ था ।

20.रा

ज्य के विद्वान अधिवक्ता द्वारा प्रस्तुत

(

Sooraj

पू

र्वोक्त

) में

माननीय केरल उच्च

न्

यायालय द्वारा ‘लोक दृष्टि’ की अवधारणा को निम्न अभिमत के माध्यम से स्पष्ट किया

या है—

“29. The digital presence of persons through the internet has

brought a change to the concept, purport and meaning

of the word ‘public view’ in sections 3(1)(r) and 3(1)(s).

When the victim accesses the content already uploaded

to the internet, she becomes directly and constructively

present for the purpose of applying the penal provisions

of the Act. Thus, when insulting or abusive content is

uploaded to the internet, the victim of the abuse or

insult can be deemed to be present each time she

accesses it. The third ingredient of sections 3(1)(r) and

3(1)(s) of the Act is also thus satisfied.”

21.इस न्

यायदृष्टांत वाले मामले में समाचार प्रसारण माध्यम द्वारा साक्षात्कार का दृश्य

-श्र

व्य

प्र

सारण किया गया था तथा उसके प्रसारण का स्थान भी स्पष्ट रूप से ज्ञात था

, ज

बकि

वि

चाराधीन प्रकरण के तथ्य इससे पूर्णतः भिन्न हैं । इसलिए उक्त न्यायदृष्टांत का लाभ

16 / 16

{Cr. A. No.-2273 of 2025}

भियोजन

/रा

ज्य पक्ष को प्राप्त नहीं होता ।

22.उ

पर्युक्त विवेचना के आधार पर यह न्यायालय पाती है कि मामले में ‘लोक स्थान’ अथवा

लोक दृष्टि में आने वाले स्थान’ के संबंध में आवश्यक साक्ष्य संकलित नहीं किए गए हैं

,

था पुलिस विवेचना में अन्य महत्वपूर्ण कमियां भी परिलक्षित होती हैं । फलतः अपीलार्थी

/अ

भियुक्त के विरुद्ध प्रथमदृष्टया आरोप स्थापित नहीं होते ।

सी स्थिति में विचारण को

जा

री रखा जाना न्यायालय के समय का अपव्यय होगा तथा न्यायिक प्रक्रिया का समुचित

पयोग नहीं कहा जा सकता । अतः ‘प्रश्नाधीन आदेश’ के तहत विरचित आरोप स्थिर

खे जाने योग्य नहीं हैं । परिणामस्वरूप

, अ

पील

स्

वीकार

की जाती है । ‘प्रश्नाधीन

देश’ अपास्त किया जाता है तथा अपीलार्थी

/अ

भियुक्त को भारतीय न्याय संहिता

,

2023 की

धारा

296 ए

वं विशेष अधिनियम की धारा

3(1)(ध) के

आरोप से उन्मुक्त

कि

या जाता है ।

23.नि

र्णय की प्रति के साथ विचारण न्यायालय को मूल अभिलेख आवश्यक कार्यवाही हेतु

सू

चनार्थ एवं अनुपालनार्थ शीघ्रतापूर्वक प्रेषित हो ।

ही

/-

(सं

जय कुमार जायसवाल

)

न्

यायाधीश

पो

मन

Reference cases

Description

Legal Notes

Add a Note....

Advance Search Tool

💡 How to Get the Best Legal Answers:

1. Keep it simple: Frame your question in plain language.

2. Add scope: Tag @ a court, judge, year, or act section for accurate results.

3. Attach files: Upload a PDF only if you are using a private document.

🌍 Ask in your language: English • Hindi • Assamese • Bangla • Gujarati • Kannada • Malayalam • Marathi • Odia • Punjabi • Tamil • Telugu • Urdu

Add research context Type to filter