As per case facts, appellants Manish Kanwar and Khilesh Kanwar, after an initial dispute, returned to the victim's shop where Manish slapped him, and Khilesh then stabbed him in the ...
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{Cr. A. No.-1049 of 2025 & 1199 of 2025}
2026:CGHC:15363
अप्र
तिवेद्य
छ
त्तीसगढ़ उच्च न्यायालय
, बि
लासपुर
नि
र्णय सुरक्षित दिनांक
-25/03/2026
नि
र्णय उद्घोषित दिनांक
-02/04/2026
दा
ण्डिक अपील क्रमांक
-1049 /2025
म
नीष कंवर
पि
ता
-प
रमानंद कंवर
, उम्र-लगभग 21 व
र्ष
, नि
वासी
-ग्रा
म खम्हरिया
,
आ
वासपारा
, पु
लिस थाना
-सी
पत
, जि
ला
-बि
लासपुर
, छ
त्तीसगढ़
-----अ
पीलार्थी
/अ
भियुक्त
वि
रूद्घ
छ
त्तीसगढ़ राज्य
, द्वा
रा जिला दण्डाधिकारी
, जि
ला
-बि
लासपुर
, छ
त्तीसगढ़
-----उ
त्तरवादी
/रा
ज्य
ए
वं
दा
ण्डिक अपील क्रमांक
-1199 /2025
खि
लेश कंवर उर्फ छोटू पिता
-प
रमानंद कंवर
, उम्र-लगभग 19 व
र्ष
, नि
वासी
-ग्रा
म
खम्ह
रिया
, आ
वासपारा
, पु
लिस थाना
-सी
पत
, जि
ला
-बि
लासपुर
, छ
त्तीसगढ़
,
-----अ
पीलार्थी
/अ
भियुक्त
वि
रूद्घ
छ
त्तीसगढ़ राज्य
, द्वा
रा जिला दण्डाधिकारी
, जि
ला
-बि
लासपुर
, छ
त्तीसगढ़
-----उ
त्तरवादी
/रा
ज्य
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अ
पीलार्थीगण
/अ
भियुक्तगण द्वारा
:श्री
प्रवीण सोनी
, अ
धिवक्ता ।
उ
त्तरवादी
/रा
ज्य द्वारा
:श्री
अमन ताम्रकार
, पै
नल अधिवक्ता ।
न्
यायमूर्ति श्री संजय कुमार जायसवाल
!! सी.ए.वी. नि
र्णय
!!
1.भा
रतीय नागरिक सुरक्षा संहिता
, 2023 की
धारा
-415 (2) के
तहत प्रस्तुत इस दाण्डिक
अ
पील में विचारण न्यायालय
-द
शम अपर सत्र न्यायाधीश
, बि
लासपुर
, जि
ला
-बि
लासपुर
,
(छ
त्तीसगढ़
) द्वा
रा सत्र प्रकरण क्रमांक
101/2022 “छ
त्तीसगढ़ राज्य
वि
रुद्ध
खिलेश कंवर
उ
र्फ छोटू एवं एक अन्य
” में
पारित निर्णय दिनांक
23/05/2025 को
चुनौती दी गई
है
। जिसके तहत अपीलार्थीगण को निम्नानुसार दोषसिद्ध कर दण्डित किया गया है ।
जि
से आगे संक्षेप में
“प्रश्
नाधीन निर्णय
”
से संबोधित किया जा रहा हैः
-
अ
पीलार्थी का नाम
दो
षसिद्धि
द
ण्डादेश
खि
लेश कंवर उर्फ
छो
टू
धा
रा
-307 भा
रतीय
द
ण्ड संहिता
, 1860
07 व
र्ष का सश्रम कारावास एवं
10,000/-रू
पये का अर्थदण्ड तथा
अ
र्थदण्ड राशि अदा न करने की दशा में
06 मा
ह का अतिरिक्त सश्रम कारावास
की
सजा ।
म
नीष कंवर
धा
रा
-307/34
भा
रतीय दण्ड संहिता
,
1860
07 व
र्ष का सश्रम कारावास एवं
10,000/-रू
पये का अर्थदण्ड तथा
अ
र्थदण्ड राशि अदा न करने की दशा में
06 मा
ह का अतिरिक्त सश्रम कारावास
की
सजा ।
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2.अ
भियोजन मामला संक्षेप में इस प्रकार है कि आहत
/प्रा
र्थी सत्यनारायण सोनझरी
(अ.सा.-2) की
पत्नी सुनीता बाई सोनझरी
(अ.सा.-4) है
। सुनीता बाई की बहन
ध
नकुमारी कंवर
(अ.सा.-5) है
तथा धनकुमारी कंवर के पति लव कुमार सोनझरी
(अ.सा.-10) हैं
। इस प्रकार आहत सत्यनारायण
(अ.सा.-2) ए
वं लव कुमार
(अ.सा.-
10) आ
पस में साढ़ू भाई हैं ।
घ
टना
, दि
नांक
17/12/2021 को
शाम लगभग
06:30
ब
जे की है । आहत सत्यनारायण
, जो
ग्राम खम्हरिया का निवासी है
, पू
जन सामग्री विक्रय
का
कार्य करता है । ग्राम खम्हरिया में राउत बाजार लगता है
, ज
हाँ घटना के दिन वह
अ
पनी दुकान लगाकर बैठा था । उसी समय उसका साढ़ू भाई लव कुमार
(अ.सा.-10)
अ
पनी पत्नी धनकुमारी कंवर
(अ.सा.-5) के
साथ बाजार घूमने आया था । राउत बाजार
में
झूले के पास लव कुमार का अपीलार्थीगण से विवाद हो गया
, जि
से आहत सत्यनारायण
ने
समझाइश देकर शांत करा दिया और वह पुनः अपनी दुकान पर आकर बैठ गया ।
त
त्पश्चात् शाम लगभग
06:30 ब
जे
, ज
ब सुनीता बाई सोनझरी
(अ.सा.-4), ल
व कुमार
(अ.सा.-10) ए
वं धनकुमारी कंवर
(अ.सा.-5) व
हाँ उपस्थित थे
, उ
सी समय
अ
पीलार्थीगण पुनः आए । अपीलार्थी मनीष ने प्रार्थी सत्यनारायण को माँ
-ब
हन की गाली
दे
ते हुए आरोप लगाया कि उसी ने उसे मारा था और एक थप्पड़ प्रार्थी सत्यनारायण को
मा
रा । इसी दौरान अपीलार्थी खिलेश कंवर उर्फ छोटू ने चाकू से सत्यनारायण के पेट में
वा
र किया
, जि
ससे उसे गंभीर चोट आई और रक्तस्राव होने लगा । तत्पश्चात् उसे एंबुलेंस
के
माध्यम से उपचार हेतु स्वास्तिक अस्पताल भेजा गया । उसी दिन रात्रि लगभग
11:45
ब
जे पुलिस द्वारा सत्यनारायण की सूचना पर देहाती नालसी
(प्र
दर्श पी
-5) तै
यार कर
था
ना सीपत में अपराध क्रमांक
615/2021 का
प्रथम सूचना पत्र
(प्र
दर्श पी
-18) पं
जीबद्ध
कि
या गया । आहत का चिकित्सीय परीक्षण एवं उपचार कराया गया । विवेचना के दौरान
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बे
ड
-हे
ड टिकट जब्त किया गया
, घ
टनास्थल का नक्शा तैयार किया गया तथा साक्षियों के
क
थन लिए गए । अपीलार्थी खिलेश के मेमोरण्डम कथन के आधार पर उससे घटना में
प्र
युक्त कथित चाकू की जब्ती की गई । तत्पश्चात् अपीलार्थीगण को गिरफ्तार कर संपूर्ण
वि
वेचना उपरांत अभियोग पत्र प्रस्तुत किया गया ।
3.वि
चारण के दौरान आरोप के प्रमाणन हेतु अभियोजन की ओर से अपने पक्ष के समर्थन में
कु
ल
11 सा
क्षियों का परीक्षण कराया गया तथा
22 द
स्तावेज प्रदर्शित चिन्हांकित कराए
गए ।
धारा
313 द
ण्ड प्रक्रिया संहिता के तहत कथन में अपीलार्थीगण
/अ
भियुक्तगण ने
अ
पने विपरीत आए साक्षियों के कथनों को इंकार करते हुए कहा है कि वे मौके पर उपस्थित
ही
नहीं थे । प्रार्थी सत्यनारायण और उसकी पत्नी द्वारा मिलकर उन्हें झूठा फंसाया गया
है
। बचाव साक्षी के रूप में अख्तर मोहम्मद
(ब.सा.-1) और
रंजीत सिंह
(ब.सा.-2) का
प
रीक्षण कराया है जो मौके पर नहीं थे किंतु उन्होंने कहा है कि अपीलार्थीगण कथित घटना
के
समय रायगढ़ आए हुए थे और मौके पर नहीं थे ।
उभ
यपक्ष काे सुना जाकर विचारण
न्
यायालय द्वारा अपीलार्थीगण
/अ
भियुक्तगण को इस निर्णय की कण्डिका
-1 के
अनुसार
दो
षसिद्ध कर दण्डित किया गया है । जिसे इस अपील में चुनौती दी गई है ।
4.अ
पीलार्थीगण
/अ
भियुक्तगण के विद्वान अधिवक्ता का तर्क है कि प्रार्थी सत्यनारायण के कथन
में
गंभीर विरोधाभास हैं । परीक्षित सभी साक्षी
, जि
न्हें चश्मदीद साक्षी बताया गया है
, प्रा
र्थी
सत्
यनारायण के निकट संबंधी हैं
, जि
ससे उनकी साक्ष्य की विश्वसनीयता संदिग्ध हो जाती
है
।
य
ह भी तर्क प्रस्तुत किया कि अपीलार्थी खिलेश से कथित चाकू की जब्ती संदेह से परे
प्र
माणित नहीं हुई है । अभियोजन किसी स्वतंत्र साक्षी का परीक्षण कराने में असफल रहा
है
। चिकित्सक ने यह अभिमत व्यक्त किया है कि प्रार्थी सत्यनारायण की चोटें ज़मीन पर
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प
ड़े किसी धारदार लोहे के उपकरण पर गिरने से भी कारित हो सकती हैं । विद्वान
अ
धिवक्ता ने आगे तर्क दिया है कि भारतीय दण्ड संहिता की धारा
34 के
अंतर्गत सामान्य
आश
य के गठन हेतु “एकमत
( )”
meeting of minds
का
होना आवश्यक है
, जि
से
अ
भियोजन प्रमाणित करने में असफल रहा है । यदि अपीलार्थी खिलेश द्वारा कोई कृत्य
कि
या भी गया हो
, तो
उसमें अपीलार्थी मनीष का कोई सामान्य आशय विद्यमान था
, य
ह
अ
भियोजन प्रमाणित नहीं कर सका है । अतः अपीलार्थी मनीष के विरुद्ध सामान्य आशय
के
आधार पर अपराध में सहभागिता प्रमाणित नहीं होती है । विद्वान अधिवक्ता ने अपने
त
र्क के समर्थन में
907 & . Constable Surendra Singh Another v State of
, (2025) 5 433Uttarakhand SCC के
निर्णय का हवाला दिया है । जहाँ तक
अ
पीलार्थी खिलेश का संबंध है
, उस
के विरुद्ध भी अपराध संदेह से परे प्रमाणित नहीं हुआ
है
। तथापि
, वै
कल्पिक रूप से यह निवेदन किया गया है कि उसकी अभिरक्षा अवधि
लगभग 11 मा
ह
10 दि
न हो चुकी है । उपचार के दौरान उसने प्रार्थी सत्यनारायण को
लगभग ₹65,000 से
₹
85,000 त
क का आर्थिक सहयोग भी प्रदान किया है ।
अ
पीलार्थी खिलेश की वर्तमान आयु लगभग
19 व
र्ष है
, उस
का कोई पूर्व आपराधिक
इ
तिहास नहीं है तथा उस पर पारिवारिक दायित्व भी हैं । अतः निवेदन किया है कि यदि
उ
से दोषी ठहराया भी जाता है
, तो
उसे प्रदत्त
07 व
र्ष के कारावासी दण्ड को उसकी अब
त
क की अभिरक्षा अवधि तक सीमित किया जाए ।
5.रा
ज्य
/उ
त्तरवादी के विद्वान अधिवक्ता का तर्क है कि प्रार्थी सत्यनारायण द्वारा वर्णित घटना
के
अनुसार
, प्रा
रंभिक विवाद के कारण अपीलार्थीगण
, जो
आपस में सगे भाई हैं
, रं
जिशवश
ए
वं एकमत होकर पुनः प्रार्थी की दुकान पर आए थे । वहाँ अपीलार्थी मनीष ने पहले
सत्
यनारायण को गाली
-ग
लौज करते हुए थप्पड़ मारा तथा उसी दौरान अपीलार्थी खिलेश
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ने
उसके पेट में चाकू से वार किया । उक्त समस्त तथ्य एवं परिस्थितियाँ इस बात को स्पष्ट
कर
ती हैं कि अपीलार्थीगण सामान्य आशय के साथ घटनास्थल पर आए थे और उसी
आश
य की पूर्ति में पहले अपीलार्थी मनीष द्वारा मारपीट की शुरुआत की गई
, त
त्पश्चात
अ
पीलार्थी खिलेश द्वारा चाकू से वार किया गया । चश्मदीद साक्षियों का रिश्तेदार होना
,
प्रकर
ण की परिस्थितियों में स्वाभाविक है और मात्र इस आधार पर उनके कथनों को
अ
विश्वसनीय नहीं माना जा सकता । प्रार्थी सत्यनारायण ने अभियोजन के कथन का पूर्ण
स
मर्थन किया है
, जो
चिकित्सीय एवं अन्य साक्ष्य से भी पुष्ट है । इसके अतिरिक्त
,
अ
पीलार्थी खिलेश से घटना में प्रयुक्त चाकू की विधिवत जब्ती की गई है । अतः विचारण
न्
यायालय द्वारा अपीलार्थीगण को दोषसिद्ध कर पारित किया गया दण्डादेश विधिसम्मत एवं
न्
यायोचित है
, जि
समें किसी प्रकार के हस्तक्षेप अथवा
परिवर्तन की आवश्यकता नहीं है ।
अ
पीलार्थी पक्ष के तर्क स्वीकार योग्य नहीं हैं । अतएव
, अ
पील खारिज की जाए ।
6.उभ
यपक्ष का तर्क श्रवण किया गया और अभिलेख का सूक्ष्मतापूर्वक परिशीलन किया गया ।
7.प्रा
र्थी सत्यनारायण
(अ.सा.-2) ने
अभियोजन मामले की पुष्टि करते हुए अपने न्यायालयीन
सा
क्ष्य में कहा है कि घटना दिनांक
17/12/2021 को, ज
ब वह ग्राम खम्हरिया के राउत
बा
जार में अपनी दुकान लगाकर बैठा था
, त
ब उसका साढ़ू भाई लव कुमार वहाँ घूमने आया
था, ज
हाँ अपीलार्थीगण का उससे विवाद हो गया । उसने समझाइश देकर उक्त विवाद को
शां
त कराया
, जि
सके पश्चात अपीलार्थीगण वहाँ से चले गए ।
कु
छ समय बाद
अ
पीलार्थीगण अन्य व्यक्तियों के साथ पुनः उसकी दुकान पर आए
, ज
हाँ अपीलार्थी मनीष ने
उ
से माँ
-ब
हन की गाली देते हुए एक थप्पड़ मारा । तत्पश्चात अपीलार्थी खिलेश ने चाकू से
उस
के पेट में वार किया
, जि
ससे उसे चोट आई और रक्तस्राव होने लगा । इसके बाद उसे
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एं
बुलेंस के माध्यम से उपचार हेतु अस्पताल ले जाया गया । प्रतिपरीक्षण में प्रार्थी ने यह
क
हा है कि अपीलार्थीगण से उसकी कोई पूर्व शत्रुता नहीं थी । उसके उक्त कथन का
स
मर्थन मौके पर उपस्थित उसकी पत्नी सुनीता बाई सोनझरी
(अ.सा.-4), सा
ढ़ू भाई लव
कु
मार
(अ.सा.-10) त
था धनकुमारी कंवर
(अ.सा.-5) ने
भी अपने न्यायालयीन साक्ष्य में
कि
या है जिसका खण्डन नहीं हुआ है ।
8.चि
कित्सक अभिषेक मिश्रा
(अ.सा.-7) ने
अपने न्यायालयीन साक्ष्य में बताया है कि वह
स्
वास्तिक अस्पताल का संचालक है
, ज
हाँ दिनांक
17/12/2021 को
शाम लगभग
07:37 ब
जे आहत सत्यनारायण को उपचार हेतु लाया गया था । उसके पेट में चाकू से
चो
ट लगी थी तथा दर्द के कारण पेट में कड़ापन पाया गया । दायीं पसली से लगभग
4
से.मी. नी
चे घाव विद्यमान था । उसने
आह
त को भर्ती कर उपचार प्रारंभ किया तथा सिटी
स्
कैन कराने की सलाह दी । रिपोर्ट प्राप्त होने पर यह पाया कि पेट के अमाशय
/पा
इलोरस
( )
stomach pylorus
में
फटने के लक्षण थे तथा पेट में वायु एवं रक्त उपस्थित था ।
स्थि
ति की गंभीरता को दृष्टिगत रखते हुए ऑपरेशन एवं उपचार की सलाह दी गई ।
चि
कित्सक ने यह भी बताया कि आंतरिक रूप से रक्त के थक्के
( )
clots
पा
ए गए थे ।
उन्
होंने इस संबंध में प्रतिवेदन
(प्र
दर्श पी
-16) प्रस्
तुत किया तथा स्पष्ट किया कि आहत
को
लगी चोटें गंभीर प्रकृति की थीं ।
9.ओं
कार अस्पताल के चिकित्सक आकाश मिश्रा
(अ.सा.-3) ने
अपने न्यायालयीन साक्ष्य
में
बताया है कि दिनांक
18/12/2021 को
आहत सत्यनारायण को उपचार हेतु अस्पताल
ला
या गया था । परीक्षण करने पर पाया गया कि उसके पेट में धारदार हथियार से चोट
ल
गी थी
, जि
ससे आंत फट चुकी थी तथा पेट में रक्त का जमाव था ।
स्थि
ति की गंभीरता
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को
देखते हुए उसका तत्काल ऑपरेशन किया गया । उपचार उपरांत दिनांक
24/12/
2021 को
उसे अस्पताल से छुट्टी
(डि
स्चार्ज
) दे
दी गई ।
10.इस प्र
कार
, उ
परोक्त विवेचना से यह स्पष्ट होता है कि आहत सत्यनारायण को पेट में
धा
रदार हथियार
, अ
र्थात् चाकू से गंभीर चोट पहुंचाई गई थी । अभियोजन प्रकरण में
अ
पीलार्थी खिलेश के प्रकटीकरण कथन के आधार पर घटना में प्रयुक्त चाकू की विधिवत
ज
ब्ती की गई है । उक्त चाकू का परीक्षण कर चिकित्सक अभिषेक मिश्रा
(अ.सा.-7) द्वा
रा
प्र
तिवेदन
(प्र
दर्श पी
-17) को
पुष्ट कर बताया है कि आहत सत्यनारायण को कारित चोटें
उक्त
चाकू से हो सकती हैं ।
स
मस्त साक्ष्य के परीक्षण से यह तथ्य स्पष्ट रूप से स्थापित
हो
ता है कि अपीलार्थी खिलेश ने चाकू से सत्यनारायण के पेट में वार कर उसे गंभीर
उ
पहति कारित की
, जि
ससे उसकी आंतें फट गईं । इन परिस्थितियों के आधार पर यह
प्र
माणित होता है कि अपीलार्थी खिलेश द्वारा किया गया कृत्य हत्या के प्रयास के अपराध
की
श्रेणी में आता है ।
11.ज
हाँ तक
, अ
पीलार्थी मनीष का मुख्य अभियुक्त खिलेश के साथ सामान्य आशय निर्मित
हो
ने का प्रश्न है । इस संदर्भ में अपीलार्थी पक्ष द्वारा न्यायदृष्टांत
कॉ
न्स्टेबल
907 सु
रेन्द्र
सिं
ह एवं अन्य
(पू
र्वोक्त
) के
प्रकरण में माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा कण्डिका
-30 में
नि
म्नानुसार विधि सिद्धांत प्रतिपादित किया गया है—
“30.By now it is a settled principle of law that for
convicting the accused with the aid of Section 34IPC
the prosecution must establish prior meetings of minds.
It must be established that all the accused had pre-
planned and shared a common intention to commit the
crime with the accused who has actually committed the
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crime. It must be established that the criminal act has
been done in furtherance of the common intention of
all the accused. Reliance in support of the aforesaid
proposition could be placed on the following judgments
of this Court in the cases of:
(i)Ezajhussain Sabdarhussain v. State of Gujarat,
(2019) 14 SCC 339;
(ii)Jasdeep Singh v. State of Punjab, (2022) 2 SCC
545;
(iii)Gadadhar Chandra v. State of W.B., (2022) 6
SCC 576; and
(iv)Madhusudan v. State of M.P., (2024) 15 SCC
757.”
12.उ
परोक्त के अलावा
'सा
मान्य आशय
' के
विषय में माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा
स
मय
-स
मय पर अनेक महत्वपूर्ण अभिमत दिया गया है । जिनका उल्लेख यहां किया जाना
आ
वश्यक व उचित होगा ।
13.मा
ननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा
मो
हन सिंह बनाम पंजाब राज्य
, 1963 174
AIR SC
में
य
ह प्रतिपादित किया गया है कि
सामान्य आशय का तात्पर्य सामूहिक रूप से किया गया
का
र्य तथा पूर्व में मतों का मिलन है
, और
कृत्य भिन्न
-भि
न्न एवं स्वरूप में अलग
-अलग
हो
सक
ते हैं
, कि
न्तु वे सभी एक ही सामान्य आशय से प्रेरित होते हैं । उक्त निर्णय की
क
ण्डिका–
13 नि
म्नानुसार है—
“13. That inevitably takes us to the question as to whether
the appellants can be convicted under Section 302/34.
Like Section 149, Section 34 also deals with cases of
constructive criminal liability. It provides that where a
criminal act is done by several persons in furtherance of
the common intention of all, each of such persons is
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liable for that act in the same manner as if it were done
by him alone. The essential constituent of the vicarious
criminal liability prescribed by Section 34 is the
existence of common intention. If the common intention
in question animates the accused persons and if the said
common intention leads to the commission of the
criminal offence charged, each of the persons sharing
the common intention is constructively liable for the
criminal act done by one of them. Just as the
combination of persons sharing the same common
object is one of the features of an unlawful assembly, so
the existence of a combination of persons sharing the
same common intention is one of the features of Section
34. In some ways the two sections are similar and in
some cases they may overlap. But, nevertheless, the
common intention which is the basis of Section 34 is
different from the common object which is the basis of
the composition of an unlawful assembly. Common
intention denotes action-in-concert and necessarily
postulates the existence of a prearranged plan and that
must mean a prior meeting of minds. It would be
noticed that cases to which Section 34 can be applied
disclose an element of participation in action on the part
of all the accused persons. The acts may be different;
may vary in their character, but they are all actuated by
the same common intention. It is now well-settled that
the common intention required by Section 34 is
different from the same intention or similar intention.
As has been observed by the Privy Council in Mahbub
Shah v. King-Emperor4 common intention within the
meaning of Section 34 implies a pre- arranged plan, and
to convict the accused of an offence applying the section
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it should be proved that the criminal act was done in
concert pursuant to the pre-arranged plan and that the
inference of common intention should never be reached
unless it is a necessary inference deducible from the
circumstances of the case.”
14.मा
ननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा
शि
वराम सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य
, (1973) 3
110
SCC
में
यह प्रतिपादित किया गया है कि पूर्व नियोजन
( - )
pre concert
के
रूप में
कि
सी स्पष्ट पूर्व योजना का सिद्ध किया जाना आवश्यक नहीं है
; सा
मान्य आशय किसी
वि
शेष परिणाम को प्राप्त करने के लिए
, प्रकर
ण के तथ्यों एवं परिस्थितियों के संदर्भ में
,
अ
नेक व्यक्तियों के बीच घटना स्थल पर ही विकसित हो सकता है ।
15.मा
ननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा
दु
खमोचन पांडेय एवं अन्य बनाम बिहार राज्य
, (1997)
8 405
SCC
में
यह प्रतिपादित किया गया है कि भारतीय दण्ड संहिता की धारा
34 के
अ
नुप्रयोग हेतु यह आवश्यक है कि साक्ष्य एवं प्रकरण की परिस्थितियाँ इस तथ्य को
स्
थापित करें कि विभिन्न अभियुक्तों के मध्य मनों का मिलन
( )
meeting of minds
ए
वं
वि
चारों का समन्वय
( )
fusion of ideas
हु
आ था ।
16.मा
ननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा
सु
रेश बनाम उत्तर प्रदेश राज्य
, (2001) 3 673
SCC
में
यह प्रतिपादित किया गया है कि भारतीय दण्ड संहिता की धारा
34 के
आकर्षण हेतु दो
आ
वश्यक तत्व अनिवार्य हैं
, अ
र्थात् अपराध किसी एक व्यक्ति द्वारा नहीं बल्कि एक से
अ
धिक व्यक्तियों द्वारा किया गया हो तथा ऐसे प्रत्येक व्यक्तिगत कृत्य का समेकित परिणाम
,
जो
अपराध के घटित होने में परिणत हुआ हो
, स
भी व्यक्तियों के सामान्य आशय की पूर्ति में
कि
या गया हो
; उक्त
निर्णय की कण्डिका–
23 नि
म्नानुसार हैः
-
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{Cr. A. No.-1049 of 2025 & 1199 of 2025}
“23.Thus to attract Section 34 IPC two postulates are
indispensable: (1) The criminal act (consisting of a
series of acts) should have been done, not by one
person, but more than one person. (2) Doing of every
such individual act cumulatively resulting in the
commission of criminal offence should have been in
furtherance of the common intention of all such
persons.”
17.मा
ननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा
दा
नी सिंह बनाम बिहार राज्य
, 2005 ( )
SCC Cri
127 में
यह प्रतिपादित किया गया है कि सामान्य आशय का निष्कर्ष प्रत्यक्ष साक्ष्य से
अ
थवा परिवेशी परिस्थितियों एवं पक्षकारों के आचरण से निकाला जा सकता है
; अ
तः यह
कि
कोई कृत्य सामान्य आशय की पूर्ति में किया गया है
, य
ह तथ्य का प्रश्न है
, न
कि विधि
का
प्रश्न ।
18.मा
ननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा
स
नी कपूर बनाम संघ शासित क्षेत्र चंडीगढ़
, (2006)
10 182
SCC
में
यह प्रतिपादित किया गया है कि भारतीय दण्ड संहिता की धारा
34 के
आक
र्षण हेतु दो तत्वों का स्थापित होना आवश्यक है—प्रथम
, अ
पराध करने का सामान्य
आश
य तथा द्वितीय
, अ
पराध के क्रियान्वयन में सहभागिता
; य
दि ये दोनों तत्व सिद्ध हो
जा
ते हैं
, तो
सामान्य आशय साझा करने वाले प्रत्येक अभियुक्त के विरुद्ध पृथक रूप से
प्रत्
यक्ष कृत्य
( )
overt act
का
होना आवश्यक नहीं है ।
19.मा
ननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा
सै
यद यूसुफ हुसैन बनाम आंध्र प्रदेश राज्य
, (2013) 4
517
SCC
में
यह प्रतिपादित किया गया है कि अपराध का कृत्य एक से अधिक व्यक्तियों
द्वा
रा किया जाना आवश्यक है तथा अपराध के क्रियान्वयन में वे सभी व्यक्ति
, कृ
त्य या
उ
पेक्षा
(
commission
या
)
omission
के
माध्यम से
, स
मान आशय साझा करते हों
;
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प्रत्
येक अभियुक्त द्वारा पृथक
-पृ
थक कृत्य किया जाना आवश्यक नहीं है ताकि उसे अंतिम
आ
पराधिक कृत्य के लिए उत्तरदायी ठहराया जा सके ।
20.मा
ननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा
वि
जेन्द्र सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य
, (2017) 11
SCC
129 में
यह प्रतिपादित किया गया है कि यह सिद्धांत अपराध करने के सामान्य आशय के
सा
थ किसी कृत्य में सहभागिता को समाहित करता है
, और
जैसे ही ऐसी सहभागिता
स्
थापित हो जाती है
, धा
रा
34 का
प्रावधान तत्काल लागू हो जाता है ।
21.उ
परोक्त न्यायदृष्टांतों के प्रकाश में
, प्रकर
ण में उपलब्ध तथ्य एवं साक्ष्य पर विचार करने पर
आह
त सत्यनारायण के साढ़ू भाई लव कुमार
(अ.सा.-10) के
कथन से यह स्थापित होता
है
कि मड़ई मेले में अपीलार्थीगण द्वारा उसकी पत्नी धनकुमारी
(अ.सा.-5) के
साथ
छे
ड़छाड़ की गई थी
, जि
सके कारण विवाद उत्पन्न हुआ था । उक्त विवाद को आहत
सत्
यनारायण द्वारा समझाइश देकर शांत कराया गया था । किन्तु इसके कुछ समय पश्चात
ही
दोनों अपीलार्थीगण पुनः प्रार्थी सत्यनारायण की दुकान पर आए
, ज
हाँ उसकी पत्नी
सु
नीता बाई
(अ.सा.-4), सा
ढ़ू भाई लव कुमार
(अ.सा.-10) त
था धनकुमारी
(अ.सा.-
5) उ
पस्थित थे । वहाँ अपीलार्थी मनीष ने पहले प्रार्थी सत्यनारायण को थप्पड़ मारा
,
त
त्पश्चात अपीलार्थी खिलेश ने उसके पेट में चाकू से वार किया । साक्षियों के कथनों से
य
ह तथ्य निर्विवाद रूप से प्रमाणित होता है कि पूर्व में हुए विवाद को लेकर दोनों
अ
पीलार्थीगण अन्य व्यक्तियों के साथ सत्यनारायण की दुकान पर आए थे । घटनाक्रम से
य
ह भी स्पष्ट होता है कि पहले अपीलार्थी मनीष द्वारा मारपीट की शुरुआत की गई और
उस
के पश्चात अपीलार्थी खिलेश द्वारा चाकू से वार किया गया । ये समस्त परिस्थितियाँ
इस
बात की ओर संकेत करती हैं कि अपीलार्थीगण सामान्य आशय के साथ घटनास्थल
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प
र आए थे । यह भी परिलक्षित होता है कि अपीलार्थी मनीष द्वारा थप्पड़ मारकर उक्त
सा
मान्य आशय के क्रियान्वयन की शुरुआत की गई तथा उसके पश्चात अपीलार्थी खिलेश
द्वा
रा चाकू से वार कर उसे आगे बढ़ाया गया । इस प्रकार यह प्रमाणित होता है कि घटना
से
पूर्व ही दोनों अपीलार्थीगण के मध्य प्रार्थी सत्यनारायण को उक्त चोट पहुँचाने का
सा
मान्य आशय विद्यमान था । अतः विचारण न्यायालय द्वारा यह निष्कर्ष निकालना कि
अ
पीलार्थी खिलेश द्वारा प्रार्थी सत्यनारायण को चाकू से मारकर हत्या का प्रयास किया गया
त
था उस कृत्य में अपीलार्थी मनीष का भी सामान्य आशय था
, वि
धिसम्मत एवं उचित
प्र
तीत होता है । फलस्वरूप
, अ
पीलार्थी खिलेश की धारा
307 भा
रतीय दण्ड संहिता के
अं
तर्गत तथा अपीलार्थी मनीष की धारा
307/34 भा
रतीय दण्ड संहिता के अंतर्गत की गई
दो
षसिद्धि में कोई अवैधता या अशुद्घता परिलक्षित नहीं होती है । अतः उक्त दोषसिद्धि की
पु
ष्टि की जाती है ।
द
ण्डादेश
22.ज
हाँ तक दण्डादेश का प्रश्न है
, इस
संबंध में उल्लेखनीय है कि स्वयं प्रार्थी सत्यनारायण ने
अ
पने प्रतिपरीक्षण की कण्डिका–
7 में
यह स्वीकार किया है कि उपचार के दौरान
अ
पीलार्थीगण द्वारा उसे लगभग ₹
65,000 से
₹
85,000 त
क की आर्थिक सहायता
प्र
दान की गई थी । अपीलार्थी पक्ष का यह भी तर्क है कि दोनों अपीलार्थी दिनांक
18/12/2021 से
14/01/2022 त
क
, अ
र्थात् लगभग
28 दि
नों तक कारावास में रहे
त
था विचारण न्यायालय के निर्णय दिनांक
23/05/2025 से
अब तक निरंतर अभिरक्षा
में
हैं । इस प्रकार उनकी कुल अभिरक्षा अवधि लगभग
11 मा
ह
12 दि
न की हो चुकी है ।
य
ह भी अभिलेख पर है कि अपीलार्थियों का कोई पूर्व आपराधिक इतिहास नहीं है तथा
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उन्
होंने उपचार के दौरान प्रार्थी की सहायता भी की है । अतः इन समस्त परिस्थितियों को
दृ
ष्टिगत रखते हुए यह निवेदन किया गया है कि कारावासीय दण्ड को उनकी अब तक की
अ
भिरक्षा अवधि तक सीमित किया जाए ।
23.रा
ज्य पक्ष के विद्वान अधिवक्ता द्वारा अपराध की गंभीरता को रेखांकित करते हुए यह तर्क
प्रस्
तुत किया गया है कि विचारण न्यायालय द्वारा पारित दण्डादेश विधिसम्मत एवं
न्
यायोचित है ।
24.ज
हाँ तक दण्ड के प्रश्न का संबंध है
, मो
हम्मद गियासुद्दीन बनाम आंध्र प्रदेश राज्य
,
(1977) 3 287
SCC
के
प्रकरण में माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने दण्ड निर्धारण के
सं
दर्भ में सुधारात्मक सिद्धांत को विशेष महत्व देते हुए
George Bernard Shaw
के
वि
चारों का उद्धरण किया है
, जो
इस प्रकार है—“यदि आप किसी व्यक्ति को
प्र
तिशोधात्मक रूप से दण्डित करना चाहते हैं
, तो
आपको उसे आहत करना होगा
; कि
न्तु
य
दि आप उसे सुधारना चाहते हैं
, तो
आपको उसे बेहतर बनाना होगा
, और
मनुष्य चोट
प
हुँचाने से बेहतर नहीं बनते ।”
25.अ
पीलार्थीगण के विरुद्ध कोई पूर्व आपराधिक इतिहास अभिलेख पर नहीं है । गिरफ्तारी
प
त्रक प्रदर्श पी–
10 ए
वं पी–
11 के
अनुसार अपीलार्थी खिलेश कक्षा
10वीं
तक तथा
अ
पीलार्थी मनीष कक्षा
12वीं
तक शिक्षित हैं एवं दोनों डी
.जे. सं
चालित करने का व्यवसाय
कर
ते हैं । अपीलार्थी खिलेश की आयु लगभग
19 व
र्ष तथा अपीलार्थी मनीष की आयु
लगभग 21 व
र्ष है । घटना वर्ष
2021 की
है तथा अपीलार्थीगण पर पारिवारिक दायित्व भी
हैं
। किन्तु
, य
ह भी स्पष्ट रूप से प्रमाणित हुआ है कि अपीलार्थीगण ने सामान्य आशय के
अ
ग्रसरण में प्रार्थी सत्यनारायण को पेट में चाकू से वार कर गंभीर उपहति कारित की
,
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जि
ससे उसकी आंत फट गई और उसका शल्यक्रिया
(ऑ
परेशन
) द्वा
रा उपचार करना
प
ड़ा । अतः अपराध की प्रकृति एवं उसकी गंभीरता को दृष्टिगत रखते हुए
, सा
थ ही
उ
पर्युक्त समस्त परिस्थितियों पर विचार करते हुए
, य
ह न्यायालय पाती है कि अपीलार्थीगण
को
प्रदत्त कारावासी दण्ड में कुछ सीमा तक कमी किया जाना न्यायोचित होगा । जहाँ तक
अ
र्थदण्ड का संबंध है
, य
ह भी दृष्टिगत है कि अपीलार्थीगण द्वारा उपचार के दौरान प्रार्थी
सत्
यनारायण को आर्थिक सहयोग प्रदान किया गया था
, अ
तः अर्थदण्ड में किसी प्रकार का
प
रिवर्तन किया जाना आवश्यक प्रतीत नहीं होता ।
26.अ
तः अपील
आं
शिक रूप से स्वीकार
की जाती है । अपीलार्थीगण की दोषसिद्धि की पुष्टि
की
जाती है । अपीलार्थीगण को धारा
307 भा
रतीय दण्ड संहिता
/ धा
रा
307 सह
पठित
धा
रा
34 भा
रतीय दण्ड संहिता के अंतर्गत प्रदत्त
07 व
र्ष के सश्रम कारावास के दण्ड को
घ
टाकर
02 व
र्ष
06 मा
ह के सश्रम कारावास में परिवर्तित किया जाता है । अर्थदण्ड
य
थावत रखा जाता है ।
27.अ
पीलार्थीगण द्वारा विचारण एवं अपील के दौरान व्यतीत की गई अभिरक्षा अवधि को उनके
उ
पर्युक्त कारावासी दण्ड
(जो
इस निर्णय द्वारा
02 व
र्ष
06 मा
ह किया गया है
) में
स
मायोजित किया जाए ।
28.अ
पीलार्थीगण को वर्तमान में जेल में निरुद्ध बताया गया है । अतः उन्हें शेष कारावासी दण्ड
की
अवधि भुगतायी जाये ।
29.अ
र्थदण्ड राशि जमा हो जाने पर बतौर प्रतिकर के आहत सत्यनारायण सोनझरी को प्रदान
की
जावे ।
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30.नि
र्णय की प्रति के साथ विचारण न्यायालय को मूल अभिलेख तथा निर्णय की
सत्
यप्रतिलिपि संबंधित जेल अधीक्षक को आवश्यक कार्यवाही हेतु सूचनार्थ एवं पालनार्थ
शी
घ्रतापूर्वक प्रेषित हो ।
स
ही
/-
(सं
जय कुमार जायसवाल
)
न्
यायाधीश
पो
मन
Legal Notes
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